जुदा होकर भी मैं नज़दीकियाँ महसूस करता हूँ

जुदा होकर भी मैं नज़दीकियाँ महसूस करता हूँ,
बिछड़ता हूँ तो अपनी ग़लतियाँ महसूस करता हूँ.

अभी भी सूखने से बच गया है क्या कोई दरिया,
बदन में क्यों तड़पती मछलियाँ महसूस करता हूँ.

वक़ालत यूँ तो करता हूँ मैं उड़ते हर परिंदे की,
मगर पांवों में अपने बेड़ियाँ महसूस करता हूँ.

कभी एहसास होता है कि हैं पुरवाइयां मुझमें,
कभी धूआं उगलती चिमनियाँ महसूस करता हूँ.

दिलों की बात मैं जब भी लिखा करता हूँ काग़ज़ पर,
क़लम पर मैं किसी की उंगलियाँ महसूस करता हूँ.

सभी का मेरे ही अहसास से रिश्ता है वरना तो,
सभी की मैं ही क्यों मजबूरियाँ महसूस करता हूँ.

सुरेन्द्र चतुर्वेदी